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अपराध और सफेदपोश एक दूसरे के पूरक होते हैं।

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अपराध और सफेदपोश एक दूसरे के पूरक होते हैं….

 

रविन्द्र तिवारी। 11/07/2020

 

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अपराध और अपराधी दोनों का अंत बुरा होता है।एक समृद्ध और सुखी मानव जीवन के लिए यह नितान्त आवश्यक होता है कि मानव समाज भय ,आतंक,अपराध व भ्रष्टाचार मुक्त हो। जैसे – जैसे मनुष्य जानकार और बुद्धिमान होता गया ,वैसे – वैसे उसकी इच्छाएं भी बढ़ती गई,और यदि इन्हीं इच्छाओ को सहयोग मिलता गया तो निश्चय ही इन्हीं इच्छाओं की पूर्ति के लिए मनुष्य तमाम प्रकार के प्रयास करने लगता है। फिर वह स्वार्थी होकर केवल अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए मानव समाज का दुश्मन बनता चला जाता है।

 

 इस प्रकार का व्यक्ति जब लोकतांत्रिक सरकार में अपना सहरा ढूंढने का प्रयास करता है तो उसे सफेदपोश का सहारा मिलता है और यही सहारा उसे आताताई बनाने का काम करता है। यहीं से अपराध की पृष्ठभूमि तैयार होती है। समाज में तो अपराधी बनते रहते हैं और उनका अंत भी होता रहता है परंतु यदि विचारक इस बात पर ध्यान दें की इनके अपराधी बनने का मुख्य कारण क्या है तो निश्चय ही अपराधी बनने पर रोक लग सकती है। जब कोई अपराधी छोटा सा अपराध करता है उसी समय यदि उसे उसकी सजा मिल जाए तो वह अपराध करना बंद कर देता है परंतु ऐसा ना हो कर इन्हीं सफेदपोश नेताओं का उसे सहारा मिलता है जिसके सामने न्याय और पुलिस दोनों पंगु नजर आती है तो उस अपराधी का मनोबल बढ़ जाता है, और फिर वह बड़े से बड़े अपराध को अंजाम देता है।

 

 

बाद में जब वही अपराधी इन्हीं सफेदपोश नेताओं के गले की हड्डी बनने का प्रयास करता है तो उसका अंत होता है परंतु ध्यान देने वाली बात यह है कि सफेदपोश खादी और खाकी दोनों बच जाते हैं और फिर नए अपराधी को जन्म देने लगते हैं जो उनके हित की बात करें। अपराध में अपराधी और सफेदपोश दोनों बराबर की हिस्सेदार होते हैं इनमें दोनों का निजी स्वार्थ छिपा होता है इसलिए इन दोनों के बिना अपराध का ज्यादा बढ़ना संभव नहीं है।यह लेख विकास दुबे कांड को लेकर विश्लेषण किया गया है जिसे अब जातिवादी तर्कों पर अच्छा बताया जा रहा है। अपराधी को जाति के आधार पर अच्छा या बुरा कहना बिल्कुल गलत होता है अपराधी अपराधी होता है वह अपराध करते वक्त जाति और धर्म नहीं देखता उसे उस समय केवल अपना स्वार्थ दिखता है।

 

 

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भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में अपराध को खत्म करने के बहुत ही तरीके हैं जिनमें सबसे उत्तम तरीका होता है पुलिस द्वारा अरेस्ट करके अपराधियों को न्यायालय को सौंप देना और फिर न्याय प्रणाली उसके अपराध के हिसाब से उसे सजा देती है। लोकतांत्रिक देश में व्यवस्थापिका कार्यपालिका और न्यायपालिका का अपना अलग-अलग महत्व होता है यदि इस तीन अंग में किसी अंग का हनन होता है तो फिर लोकतंत्र खतरे में आ जाता है और फिर सरकार को एक नये स्तम्भ का सहारा मिलता है जिसे मीडिया कहते हैं।

 

 

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यदि यह चारों एक साथ मिलकर उचित तरीके से अपने अपने कार्य को करते हैं तो निश्चय ही एक अच्छे समाज और एक अच्छे देश का निर्माण होता है।विकास दुबे एनकाउंटर के साथ ही तमाम ऐसे रहस्य पर पर्दा पड़ गया जो रहस्य अपने साथ एक बहुत बड़े कहानी की खुलासा करने वाले थे। संभवत जिसमें खादी और खाकी दोनों पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगता था। खैर जो कुछ हो कुछ भी हो अपराधियों का अंत होना ही चाहिए और हुआ भी परंतु अपराधियों के सहायकों का पता अवश्य लगना चाहिए ताकि पुनः उस प्रकार का कोई अपराधी जन्म ना ले सके।

गलत गलत होता है चाहे इसके द्वारा किया गया हो चाहे जिस परिस्थिति में किया गया हो। एक अच्छे और सभ्य मनुष्य को चाहिए कि गलत का सहारा वह कभी ना दे। सब लोगों को एकजुट होकर के अपराध और अपराधी के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए ताकि मानव समाज भयमुक्त हो और समाज के लोग एक सुखी और निश्चिंत जिंदगी जी सकें।

 

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