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नालंदा विश्वविद्यालय को नष्ट करने वाले आक्रांता बख़्तियार खिलजी के नाम पर बसा शहर “बख्तियारपुर”

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नालंदा विश्वविद्यालय को नष्ट करने वाले आक्रांता बख़्तियार खिलजी के नाम पर बसा शहर “बख्तियारपुर”

 

शुभेन्द्र धर द्विवेदी | 02-09-2020

 

बख्तियारपुर जंक्शन,
Photo Google

जब जब प्राचीन संस्कृति और सांस्कृतिक विरासत की बात आती है तो सबसे पहला नाम भारत होता है। भारत की सांस्कृतिक विरासत और यहां पर उपजे प्राचीन वैदिक शिक्षा और शास्त्र के सामने दुनिया की शायद ही कोई सांस्कृतिक विरासत ठहर सकती थी। मगर बाहरी आक्रमणकारियों ने धीरे-धीरे इस देश की सांस्कृतिक समृद्धि को यातो लूट लिया या फिर उसे पूरी तरह से तहस नहस कर दिया। नतीजा ये हुआ कि इस देश ने अपनी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत की बहुत सी ऐसी मूल्यवान चीजों को खो दिया जिनकी वजह से उसका सिर दुनिया के सामने हमेशा ऊंचा रहता था। इन्हीं विरासतों में से एक है नालंदा विश्वविद्यालय, जो शिक्षा, धर्म शास्त्र और चिकित्सा शास्त्र का सबसे बड़ा केंद्र हुआ करता था। जो शिक्षा के क्षेत्र में प्राचीन भारत की महानतम उपलब्धियों में से एक है। जिसके विशाल पुस्तकालय के सामने हर कोई नतमस्तक था। # बख्तियारपुर

 

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लेकिन आखिर ऐसा क्या हुआ कि इस प्राचीन भारतीय शिक्षा के केंद्र जहां सिर्फ भारत ही नहीं अपितु विश्व भर के लोग शिक्षा ग्रहण करते थे उसे नष्ट कर दिया गया ? भारत में दशकों से धर्मनिरपेक्ष सरकारों ने देश को एक ऐसा गढ़ बना दिया जहां लोगों को उन्हें ही नुकसान पहुंचाने वाले और उनकी प्राचीन पौराणिक विरासत, उनके प्राचीन यथार्थ को नष्ट करने वाले क्रूर आक्रांताओं और आक्रमणकारियों को विशेष तववज्जू देने पर मजबूर होना पड़ा।

बख्तियारपुर जंक्शन,
Photo Google

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देश की राजधानी दिल्ली में ही औरंगजेब से लेकर तुगलक तक के नाम से सड़के बनवाई गई हैं हालांकि औरंगजेब का नाम बाद में हटा दिया गया लेकिन आज भी सेंट्रल दिल्ली की सबसे महत्वपूर्ण सड़कों पर इन्ही के वांसाजों ने अपना नाम लिखवा रखा है।

 

बख्तियारपुर जंक्शन,
Photo Google

गंगा नदी की पवित्र धाराओं के किनारे बसे बिहार ने यहां घटी हर घटनाओं को देखा और उसे जीवंत तक अपने अंदर संजो कर रखा है। बिहार सिर्फ भारत के लिए ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के लिए एक अति महत्वपूर्ण राज्य है।विश्व में शिक्षा का भी सबसे बड़ा केंद्र बिहार ही था जहां विक्रमशिला विश्वविद्यालय था और जहां विकसित हुआ था विश्व का दूसरा विश्वविद्यालय “नालंदा विश्वविद्यालय”।

 

जय जवान जय किसान जय विज्ञान

 

नालंदा शब्द संस्कृत के शब्द ‘नालम’ और ‘दा’ से बना हुआ है। संस्कृत में नालम का अर्थ होता है कमल और दा का मतलब है देना। हिंदू और बौद्ध धर्म में कमल ज्ञान का प्रतीक होता है। इस प्रकार नालंदा का अर्थ होता है कमल अर्थात ज्ञान देने वाली।

इस प्राचीन विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त वंश के सम्राट कुमारगुप्त प्रथम ने 413 से 455 ईशा पूर्व में की थी। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने इस विश्वविद्यालय का जिक्र विश्व के प्रमुख शिक्षा संस्थान के रूप में किया है। इनके अनुसार नालंदा विश्वविद्यालय में कुल 8500 छात्र एवं 1510 अध्यापक थे। नालंदा विश्वविद्यालय में एक अति विशाल पुस्तकालय था उसका नाम था “धर्म गंज”

 

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इस विश्वविद्यालय में सिर्फ धर्म ही नहीं बल्कि राजनीति इतिहास, ज्योतिष, भूगोल ,विज्ञान आदि की भी शिक्षा दी जाती थी। इस विश्वविद्यालय में हिंदू धर्म के वेदों और चिकित्सा सूत्र का अध्ययन होता था वहीं बौद्ध त्रिपिटका के तीनों विभाग यानी विनय, सूत्र और अभिधम्म की शिक्षा भी दी जाती थी।लेकिन एक दिन इस महान अस्तित्व का इतिहास ही खंडहर में तपदील हो गया।शिक्षा और सांस्कृतिक विरासत का ये गढ़ नष्ट हो गया और ये सब किया एक क्रूर आक्रांता “मोहम्मद बिन बख्तियार खिलजी” ने।

 

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बख्तियार खिलजी एक सनकी आदमी था जो बाद में कुतुबुद्दीन ऐबक की सेना का सेनापति बना। नाटे कद का यह क्रूर आक्रांता अपने नाम और सम्मान के लिए संघर्ष कर रहा था । दिल्ली के दरबार में अपनी एक अलग पहचान बनाने के लिए वह आए दिन बेगुनाहों पर अत्याचार करता था।
कुतुबुद्दीन ऐबक की सेना में उसे शामिल करने से मना कर दिया गया था लेकिन बिहार में उसके द्वारा बहाई गई खून की नदियों के बाद दिल्ली में उसका नाम और कद दोनों ही बहुत ऊंचा हो गया था।यह जानते हुए भी कि नालंदा विश्वविद्यालय बौद्ध धर्म का एक महत्वपूर्ण केंद्र है जहां हिंदू धर्म से जुड़े अनेकों विषयों की पढ़ाई भी होती है बख्तियार खिलजी ने शिक्षा और धर्म के इस महान केंद्र को तहस-नहस कर दिया।

 

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यहां के आचार्यों को मौत के घाट उतारा और जो बच गए वह अपनी जान बचाने के लिए तिब्बत की ओर पलायन कर गए। खिलजी ने यहां के पुस्तकालय में आग लगा दी। इतिहासकारों के अनुसार जब बख्तियार खिलजी ने यहां के पुस्तकालयों को जलाया तो वह पुस्तकालय भवन लगातार तीन महीनों तक जलता रहा।

 

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पुस्तके जलाना शिक्षकों को मारना हिंदू और बौद्घ धर्म के ऐतिहासिक धरोहरों को नष्ट करना बख्तियार खिलजी जैसे आक्रांताओं की विरासत थी। बात चाहे इतिहास की हो या वर्तमान की इन क्रूर आतंकियों द्वारा जब भी कहीं हमला किया गया तो सबसे पहले वहां उपस्थित पांडुलिपियां और पुस्तकों को नष्ट कर दिया गया।

लेकिन जिस अतांकी ने इस महान शिक्षा के केंद्र को जलाकर खाक कर दिया, उसे खंडहर में तब्दील कर दिया, हमने उसके साथ क्या किया हमने उसे एक ऐसा उपहार दिया जिससे वह आतंकी मरने के बाद भी वहीं जीवित रह गया।आज बिहार में बख्तियार खिलजी के सम्मान में पूरा एक शहर बसा हुआ है जिसे हम बख्तियारपुर के नाम से जानते हैं।जिस आतंकी ने हमारे सबसे पुराने शिक्षण और धर्म संस्थान को नष्ट कर दिया उसी के नाम पर बिहार के इस शहर का नाम रखा गया है।

 

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बख्तियारपुर वही जगह है जहां बिहार के वर्तमान “मुख्यमंत्री नीतीश कुमार” का जन्म हुआ है। नालंदा विश्वविद्यालय के बचे हुए अवशेष जहां आज भी उपलब्ध है वहां से मात्र 40 किलोमीटर की दूरी पर यह शहर बसा हुआ है।आज भी अगर रेल मार्ग से नालंदा विश्वविद्यालय जाना हुआ तो बख्तियारपुर से होकर ही गुजरना होगा।

 

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सिर्फ बख्तियारपुर ही नहीं भारत में ऐसी कई जगह हैं जिनका नाम भारत को नुकसान पहुंचाने वाले लुटेरों और आक्रांताओं के नाम पर रखा हुआ है। जो आज भी उनके द्वारा किए गए क्रूरता और अत्याचारों की याद दिलाता है। भारत इन लुटेरों और आक्रमणकारियों से तो कबका आज़ाद हो चुका है मगर उनके अस्तित्व से आज़ाद होना अभी भी बाकी है। # बख्तियारपुर

 

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