यमदग्नि की तपोस्थली

आदि गंगा गोमती के पावन तट पर स्थित है प्राचीन यमदग्निपुरम तपोस्थली…

 

सुदर्शन सिंह । 25/09/2020

 

यमदग्नि की तपोस्थली

जमैथा गांव त्रेतायुग मे महर्षि यमदग्नि की तपोस्थली है।इसलिये इसका प्राचीन नाम यमदग्निपुरम है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान परशुराम का जन्म यहीं हुआ था यहां परशुराम माता, पिता के कर्ज से मुक्त हुए। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान परशुराम ने अपने पिता यमदग्नि के आदेश पर अपनी माता रेणुका का सिर धड़ से अलग किये तब महर्षि यमदग्नि प्रसन्न होकर बोले वर मांगो परशुराम ने मां को पुऩ जीवित करने का वरदान मांग लिए। उसी समय मां जीवित हो गयी और मां प्रसन्न होकर पुत्र को दूध के कर्ज से मुक्त कर दिया। पिता पहले ही मुक्त कर चुके थे।

 

अखड़ो देवी मन्दिर

 

 

 

उन्हीं रेणुका के नाम पर अखण्ड देवी का मन्दिर बना जो आज गांव के उत्तर गोमती के तट पर अखंड देवी मन्दिर के नाम से जाना जाता है। पुरूषोत्तम राम यहां दो बार आए। पहली बार प्रतापी योध्दा कीर्तिवीर की आसुरी प्रवृत्ति से जनमानस त्रस्त था उसके वध के लिए बचपन मे भगवान राम यहां आये थे। तब वे जमैथा भी आये। दूसरी बार वनवास के दौरान आये। रामघाट की ऐतिहासिकता का सम्बन्ध भी जमैथा की पुनीत धरती से है। महर्षि विस्वामित्र के सानिध्य मे यज्ञ की रक्षा करते हुए राम अयोध्या से मिथिला की यात्रा करते है तो रामघाट पर प्रवास करते है। महर्षि विश्वामित्र और यमदग्नि की मुलाकात जमैथा में होती है। जहां राम और लक्ष्मण महर्षि यमदग्नि को दण्डवत प्रणाम करते है। इसका स्पष्ट उल्लेख वाल्मिकी रामायण में प्राप्त होता है।

 

 

 

 

नगर से लगभग 5 किलो मीटर पूरब स्थित है। जमैथा (यमदग्निपुरम) की धरती अयोध्या नरेश और काशी नरेश की सन्धि स्थली पर मौजूद थी, उनकी रक्षा का दायित्व अयोध्या नरेश और काशी नरेश की सम्मिलित जिम्मेदारी थी। जौनपुर जनपद जो अयोध्या नरेश का पूर्वी छोर का अन्तिम जनपद था यहां की समूची शासन व्यवस्था जमैथा (यमदग्निपुरम) से ही संचालित होती रही है । अर्थात जमैथा गांव को कभी राजधानी होने का गौरव भी प्राप्त रहा है।

 

 

महर्षि विस्वामित्र के सानिध्य

 

अखण्ड देवी मन्दिर के पास 18 वी सदी में एक महान संन्त बाबा परमहंस का आगमन हुआ और वही पर डेरा जमाया। वर्ष 1904 में बाबा परमहंस ने कार्तिक (अक्टूबर-नवम्बर)के महीने में समाधि ली थी। बताते है उस दिन बाबा ने शाम को अपने पास आये हुए ग्राम वासियों से जल्द ही घर जाने को कहे जब लोगो ने पूछा कि क्यो बाबा जल्द ही घर जाने को कह रहें है तो बाबा ने कहा आज रात बहुत ज्यादा कोहरा व ठंड पड़ेगी इसी लिए आप लोग घर चले जाइए। और लोग अपने घर चले गए ।

 

 

 

उसके बाद बाबा ध्यान मे जाकर अपने नाभि से अग्नि प्रज्जवलित किये उसके बाद गॉव के एक व्यक्ति ने देखा जिसने गॉव मे जाकर सभी लोगो को सुचित किया तो उन्हे देखने के लिए ग्रामवासियों की भीड़ उमड़ पड़ी। अंग्रेजी हूकूमत के तत्कालीन कलेक्टर भी पहुंचे कलेक्टर ने सोचा गांव वालो ने बाबा को आग लगा दिया यह देख कलेक्टर ने अपने मातहतो को नदी का पानी फेकने को कहे लेकिन यह पानी जैसे घी का काम करने लगा पानी पड़ते ही आग बढ़ने लगी कलेक्टर भाग खड़ा हुआ। जमैथा गांव के एक ठाकुर चौहरजा सिंह ने बाबा परमहंस की समाधि बनवाई। कई वर्ष बाद ठाकुर चौहरजा सिंह के पौत्र डाक्टर विनोद सिंह के नेत्रित्व में सभी ग्राम वासियों के सहयोग से भब्य मन्दिर का निर्माण हुआ।

 

 

अंग्रेजी हूकूमत के तत्कालीन

 

बाबा परमहंस यमदुतिया (भईया दूज) के दिन समाधि लिए थे। उसी समय बाबा ने आकासवाणी किये कि जो आज के दिन इस स्थान पर आदी गंगा गोमती में जो स्नान पुजन करेगा उसकी मनोकामना पुरा होगा और हर साल यमदुतिया के दिन नहान का विशाल मेला लगता है। अलग अलग जिले के लोग इस नहान के मेला में स्नान पुजन करते है।

 

 

दुनिया का सबसे ऊंचा मंदिर “बृहदेश्वर मन्दिर”

 

गोमती के तट पर जिस धनुष कोरि की चर्चा की है वह आज भी बाबा परमहंस के आश्रम में देखा जा सकता है वहां गोमती नदी धनुष कोरि की प्रत्यंचा की तरह अर्ध्दचन्द्राकार रूप में बहती हैं । बाबा का आश्रम धनुष पर स्थापित तीर की तरह इतनी ऊंचाई पर है कि वह सीधे धनुष पर चढ़े हुये तीर की तरह दिखायी पड़ता है यह स्वरूप भी जमैथा की पौराणिक प्रमाणिकता को सिध्द करता है ।
इस पावन धरती पर कयी भोजपुरी फिल्म के कयी बड़े स्टार रवि किशन,मनोज तिवारी फिल्म सुटिग और भक्ति एलबम की सुटिंग किये हुए हैं।

 

प्रेषक
भानु प्रताप सिंह

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