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अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद का रोचक इतिहास.

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अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद का रोचक इतिहास

Shubham Dwivedi

 

देश में प्रयागराज, नासिक, हरिद्वार और उज्जैन में कुंभ का आयोजन होता हैं। वैसे तो हर साल प्रयागराज में माघ मेले का आयोजन होता है जिसमें लाखों श्रद्धालु डुबकी

लगाने आते है।मगर कुंभ का आयोजन हर 12 साल में एक बार एक जगह पर होता है।प्रयागराज और हरिद्वार में हर छह साल में अर्धकुंभ का आयोजन किया जाता है।

कुंभ और अर्धकुंभ में स्नान के दौरान साधुओं को विशेष सुविधाएं मिलती हैं। 

 

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद का रोचक इतिहास
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नहाने के लिए विशेष प्रबंध किए जाते हैं और इनके नहाने के बाद ही आम श्रद्धालु स्नान कर सकते है। इसी तरह 1954 में प्रयागराज में कुंभ का आयोजन हुआ था,

जिसमें भगदड़ मच गई,और सैकड़ों लोगों की मौत हो गई थी।जिसके बाद अखाड़ों ने विवाद उत्पन्न होने लगा और वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गई। इससे बचने के लिए

1954 में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद की स्थापना हुई’ जिसमें कुल 13 अखाड़े शामिल हुए।इसके बाद से इसी परिसाद द्वारा सभी अखाड़ों के कुंभ और अर्धकुंभ में

स्नान का वक्त और उनकी जिम्मेदारी तय की जाती है जिसे सभी को मानना पड़ता है।

 

‘अखाड़ा’ शब्द का कुश्ती होने वाली जगह से जोड़ा जाता है।आचार्य शंकराचार्य ने देखा कि सिर्फ पूजा-पाठ से ही धर्म का विकास संभव नहीं है।इतिहास में समय समय

कई आक्रमणकारियों का सामना भी करना पड़ता था। इसीलिए शंकराचार्य ने युवा संतों को धार्मिक शिक्षा के साथ साथ शारीरिक श्रम और अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा लेने के

लिए प्रेरित किया। इसीलिए साधुओं को मठ में धार्मिक शिक्षा के साथ कसरत और युद्ध स्तर की दीक्षा भी दी जाने लगी।

 

यहीं से शुरुआत हुई हिंदू धर्म के अलग-अलग अखाड़ों की। लेकिन समय के साथ साधुओं का अखाड़ा शास्त्रार्थ, और धार्मिक विचार-विमर्श का केंद्र बन गया।

3 संप्रदायों में विभाजित है 13 अखाड़े

3 संप्रदायों में विभाजित है 13 अखाड़े
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वैरागी संप्रदाय

वैरागी संप्रदाय के पास 3 अखाड़े हैं जिसमें वैष्णव सम्प्रदाय के लोग भगवान विष्णु की आराधना करते है। भगवान वैष्णव के बहुत से उप संप्रदाय हैं, इनमें बैरागी, दास,

रामानंद, वल्लभ, निम्बार्क, माधव, राधावल्लभ, सखी और गौड़ीय शामिल है।

1. श्री दिगंबर अनी अखाड़ा, शामलाजी खाक चौक मंदिर, सांभर कांथा, गुजरात .

इस अखाड़े को वैष्णव संप्रदाय में राजा माना जाता है।

2.श्री पंच निर्मोही अनी अखाड़ा, धीर समीर मंदिर बंसीवट, वृंदावन, मथुरा, यूपी .

इस अखाड़े में कुश्ती को प्रमुखता दी जाती है जो इनके जीवन का एक हिस्सा है। इस अखाड़े के कई संत बड़े पहलवान रह चुके हैं।

3. श्री निर्वानी अनी अखाड़ा, हनुमान गढ़, अयोध्या, यूपी .

वैष्णव संप्रदाय के तीनों अनी अखाड़ों में से इसी में सबसे ज्यादा 9 अखाड़े शामिल हैं।

शैव संन्यासी संप्रदाय

भगवान शिव और उनके अवतारों को मानने वालों को शैव कहा जाते है शैव में शाक्त, नाथ, दशनामी, नाग जैसे उप संप्रदाय हैं। इनके पास कुल 7 अखाड़े है।

1.श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी, दारागंज, इलाहाबाद, यूपी

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की पूजा की जिम्मेदारी इसी अखाड़े की होती है। यह परंपरा पिछले कई साल से चली  आ रही है।

2. श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा, बाबा हनुमान घाट, वाराणसी

यह अखाड़ा सबसे बड़ा अखाड़ा है इसमें करीब 5 लाख साधु संत इससे जुड़े हैं।

3. श्री पंच अटल अखाड़ा, चौक, वाराणसी, यूपी

4. श्री पंचायती अखाड़ा निरंजनी, दारागंज, इलाहाबाद, यूपी

यह अखाड़ा सबसे ज्यादा शिक्षित अखाड़ा माना जाता है। जिसमें करीब 50 महामंडलेश्वर हैं।

5. श्री तपोनिधि आनंद अखाड़ा पंचायती, त्रयंबकेश्वर, नासिक

इस अखाड़ों में महामंडलेश्वर नहीं होते है।

6. श्री पंचदशनाम आवाहन अखाड़ा, दशाश्वमेध घाट, वाराणसी, यूपी

इस अखाड़े में महिला साध्वियों को दीक्षा नहीं दी जाती है।

7.श्री पंचदशनाम पंच अग्नि अखाड़ा, गिरीनगर, भवनाथ, जूनागढ़, गुजरात

इस अखाडा में केवल ब्रह्मचारी ब्राह्मण को ही दीक्षा देता है।

उदासीन संप्रदाय

ये सिख-साधुओं का संप्रदाय है जिसकी कुछ शिक्षाएं सिख पंथ से ली गई हैं। ये लोग सनातन धर्म को मानते हैं इसमें भी 3 अखाड़े है।

1. श्री पंचायती बड़ा उदासीन अखाड़ा, कृष्णनगर, कीडगंज, इलाहाबाद, यूपी

इस अखाड़े का उद्देश्‍य सेवा करना है।

2. श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन, कनखल, हरिद्वार, उत्तराखंड

इस अखाड़े में 8 से 12 साल तक की आयु वाले बच्चों को दीक्षा दी जाती है।

3. श्री निर्मल पंचायती अखाड़ा, कनखल, हरिद्वार, उत्तराखंड

इस अखाड़े में धूम्रपान निषेध होता है।

महामंडलेश्वर पद सबसे बड़ा होता है

महामंडलेश्वर पद का ओहदा अखाड़ों में सबसे ऊंचा होता है। हालांकि कुछ अखाड़ों में महामंडलेश्वर नहीं होते हैं। महामंडलेश्वर बनने योग्य वहीं होते है, जो शास्त्रीय पांडित्य और साधु चरित्र दोनों के लिए देश-दुनिया में जाने जाते हों। पहले ऐसे लोगों को परमहंस कहा जाता था। इसके बाद 18 वीं शताब्दी में उन्हें महामंडलेश्वर की उपाधि दी जाने लगी। महामंडलेश्वर पद धारण करने वाले में से सबसे ज्यादा ज्ञानी को आचार्य महामंडलेश्वर कहते हैं।

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