कई बार रौंदा मेरे बड़े सपनों को इस छोटी सोच वाली समाज ने

कई बार रौंदा मेरे बड़े सपनों को इस छोटी सोच वाली समाज ने  hindi poetry on life

कई बार रौंदा मेरे बड़े सपनों को इस छोटी सोच वाली समाज ने
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कई बार रौंदा मेरे बड़े सपनों को इस छोटी सोच वाली समाज ने
मेरे चरित्र के बहुत चर्चे है इस बाज़ार में
इश्क़ किया तो वैश्या कहलाई

hindi poetry on life

हक मांगा तो बेशर्म
दर्द आंसू बन कर बह तो गए
तकलीफे फिर भी कम ना हो पाई
कदम कदम पे परखी गई हूं
हर रोज़ नये सवाल उठे

नुक्कड़ से गुजरते ताने कई बार सुने
उनके हंसी का कारण कई बार बनी हूं
नाम करने की चाह थी बदनाम हो कर रह गई हूं
काश कोई मुझसे भी पूछे
बंद कमरे में कितनी बार रोयी हूं।

Writer : Pragati Chandra

याद करो कि वही हो तुम….? LOVELY POETRY IN HINDI

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