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जीवन की” शायरी”

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जीवन की” शायरी”

खुद को बार बार टूट कर बनाया है हमने,
लाखों बार खोकर भी पाया है हमने।
करके पूरे समाज को दरकिनार,
तब कहीं खुदको समझ पाया है हमने।।

किसी को को खुश करने की जरूरत न रही
जब ये जाना की हर रिश्ता निभाया है हमने।
क्या सोचते थे हम और क्या सच था,
सच और झूठ के फासले को पाया है हमने।।

वक़्त के साथ बदल जाना ही ठीक है
और फिर वक़्त को भी तो भुलाया है हमने
सारी दुनिया के झमेले छोड़कर ,
खुदको ही अपनाया है हमने।।

सबको साथ लेकर चलना तो मुमकिन न रहा
कुछ अपनों से ही दामन छुड़ाया है हमने।
खुदको बार बार टूटकर बनाया है हमने ,
खुदको खोकर भी पाया है हमने।।

By, Miss. Chhaya Singh

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